Friday, 7 July 2017

तूफ़ान कम नहीं गुजरे







इस जमीं से तूफ़ान कम नहीं गुजरे
आबाद रहे बियाबान नहीं गुजरे

कोई उसे गूंगा बनाए लिए चलता है
इंसान का ये अपमान नहीं गुजरे

दिवास्वप्न दिखाने वाले कम तो नहीं  
पतझड़ में वसंत का अवसान नहीं गुजरे

लहरों से क्या हिसाब मांगने निकले
डूबे हैं तट पर अपमान नहीं गुजरे

फरेबी चालों में अब तक नहीं उलझे
कोई अभिमन्यु चक्रव्यूह से नहीं गुजरे  
    

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-07-2015) को "शब्दों को मन में उपजाओ" (चर्चा अंक-2660) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. बहुत सुन्दर

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  3. वाह ... कई अभिमन्यु चक्र व्यूह से नहीं गुज़रे ... सच कहा है ... और इस फरेबी दुनिया में कब तक नहीं गुजरेगा ...

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