Thursday, 19 September 2013

कहना है तुमसे









नयन खुले अधखुले
सहमी सहमी है हवाएं
पलकों पर बोझिल
बेरहमी सपनों की

  लहरे लहरे केशों की
  बिखरी परिभाषा
  अधरों पर सुर्ख हो रही
  अतृप्त मन की आशा

उठा नहीं पाते जो
झुकाते हैं पलकें
मिला नहीं पाते हैं अब
अपने आप से ही नजरें

  बंधते जा रहे हैं
  मेरे ही अल्फाजों में
  सिमटते जा रहे हैं
  मेरे ही अहसासों में

दूर क्षितिज नीलांचल फैला
अपनी बांह पसारे
जीवन नौका पर बैठे हैं
मंजिल हमें निहारे

  कितने ही तूफ़ान घिरे
  पर कभी न हिम्मत हारा
  अरूणिम संध्या और उषा से
     संगम हुआ हमारा 

Thursday, 12 September 2013

चाँद जरा रुक जाओ













चाँद जरा रुक जाओ 

आने दो दूधिया रौशनी 

सितारों थोडा और चमको 

बिखेर दो रौशनी 
        

       मैं अपने महबूब को        

       ख़त लिख रहा हूँ        

       चांदनी रात में       

       महबूब को ख़त लिखना        

       कितना सुकूं देता है 

तुम यादों में बसे 

या ख्वाबों में 

दिल की गहराईयों में 

एक अहसास जगा देता है 
        

       तुम कितने पास हो         

       मैं कितना दूर         

       एक लौ है जो         

       दोनों में जली हुई 

नयनों के कोर से  

कभी देखा था तुझे 

सिमट आई थी लालिमा 

रक्ताभ कपोलों पर
          

          तारों भरी रात में           

         गीली रेत पर चलते हुए           

         हौले से छुआ था तुमने          

         सुनाई दे रही थी           

         तुम्हारे सांसों की अनुगूंज           

         नि:स्तब्द्धता को तोड़ते हुए 

तुम इतने दूर हो 

जहाँ जमीं से आसमां 

कभी नहीं मिलता 

ये ख्वाब हैं 

ख्वाब ही रहने दो  


Saturday, 7 September 2013

शब्द ढले नयनों से















इन प्रणय के कोरे कागज पर
कुछ शब्द ढले नयनों से
आहत मोती के मनकों को
चुग डालो प्रिय अंखियों से
कितने चित्र रचे थे मैंने
खुली हथेली पर
कितने छंद उकेरे तुमने
नेह पहेली पर
अवगुंठन खुला लाज का
बांच गए पोथी मन मितवा
जीत गई पिछली मनुहारें
खिले फूल मोती के बिरवा
भोर गुलाबी सप्त किरण से
मन पर तुम छाए
जैसे हवा व्यतीत क्षणों को
बीन बीन लाए
बरसों बाद लगा है जैसे
सोंधी गंध बसी हों मन में
मीलों लम्बे सफ़र लांघकर
उमर हँसी हों मन दर्पण में
नदिया की लहरों से पुलकित
साँझ ढले तुम आए
लगा कि मौसम ने खुशबू के
छंद नए गाए.


Tuesday, 3 September 2013

गुलमोहर के गाँव

                                                                                                                                             









चांदनी में खो गए हैं                                                                          
गीत यूँ मधुमास के
छंद ऋतुओं ने रचे हैं
कुंकुमी आकाश के.

 

किस सपनों में खोए
चले पिया के गाँव
सतरंगी खुशियों की चाहत
मिले प्यार की छांव.

 

दोपहरी के एकांत सहन में
खिली धूप के नील गगन में
जीत गई पिछली मनुहारें
यूँ आ गए दबे पांव.

 

उम्र के वन में
विचरते थम गए
थके हुए दो पांव
पूछते हैं फासले अब
दूर कितने गुलमोहर के गाँव.

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