बीत गए दिन गुड़ियों वाले
परियों वाली रात गयी
पंख लगाकर उड़ी कल्पना
चाहत जागी नयी नयी
मांग अटपटी सी रखती है
तन्हाई में आज उमर
पलक मूंदते ही आ जाता
सपनों में एक राजकुंवर
मानसरोवर के शतदल ज्यों
मधुबन में कोयल की गुंजन
खींच रहा विपुल वेग से
हाय ! तुम्हारा यह भोलापन
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