फिर वो दिन आ गए हैं
छलक उठे हैं
मधुमय मधुकलश
सोनजूही चम्पाकली
झूम रही मतवाली
महक उठी
जीवन की डाली
मुस्काया
प्रकृति का
कण कण
हर्षित तन मन
सिंदूरी सूर्ख
अधर करें किलोल
शिरीष के पुष्प सा
सुनहरे हुए कपोल
आम्र मंजरी से सुरभित
मन हुआ विभोर
बीता जाए
पल पल
तुम बिन
नीरस नीरव
आकुल मन
प्रतीक्षारत नैन
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