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Saturday, 28 November 2015

इक ख्याल दिल में समाया है

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मुद्दत से इक ख्याल दिल में समाया है
धरती से दूर आसमां में घर बनाया है

मोह-माया,ईर्ष्या-द्वेष इंसानी फितरतें हैं
इनसे दूर इंसान कहाँ मिलते हैं

बड़ी मुश्किल से इनसे निजात पाया है
परिंदों की तरह आसमां में घर बनाया है

साथ चलेंगी दूर तक ये हसरत थी
आंख खुली तो देखा अपना साया है

‘राजीव’ उन्मुक्त जीवन की लालसा रखे
आसमां वालों ने जबसे हमसफ़र बनाया है 
    

Saturday, 11 April 2015

उन्मुक्त परिंदे


                                                                                 
कल की चिंता से मुक्त
आज के सुख में डूबे
परिंदों को नहीं परवाह
जिंदगी की कड़वाह्टों की

सूखे पत्तों को
हांक रही मंद हवा
मोहपाश में जकड़ी हुई
हलकी और भारहीन
रेशम के कपास सी
रेशा,रेशा,महीन
उड़ी जा रही
विस्तृत गगन में

सूखे दरख्तों के
अलसाये पत्ते
पीले,कत्थे,भूरे,मटमैले
रंगबिरंगे बूंदों से
बरस रहे
सिर पर
ज्यों महावर
कुछ ऐसे ही लम्हे
ज्यों यायावर ! 
                                                                                                               
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