झूठे सपने देखे क्यूं
ये तो टूट जाते हैं
आज जिसे अपना कहेंगे
कल लोग भूल जाते हैं
बंद हो जाए जब
जहां के दरवाजे
खामोश आवाजों की
दस्तक सुन पाते हैं
मन में कुछ दिनों से
उठ रहा एक सवाल है
क्या इंसान इस तरह
जीता हर हाल है
यूं ही किसी तरह बस
गुजरा वक्त हर हाल है
उम्मीदों के पंख पर
तैरता साल दर साल है
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