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Friday, 14 August 2015

झूठे सपने



झूठे सपने देखे क्यूं
ये तो टूट जाते हैं 
आज जिसे अपना कहेंगे
कल लोग भूल जाते हैं 

बंद हो जाए जब
जहां के दरवाजे
खामोश आवाजों की
दस्तक सुन पाते हैं 

मन में कुछ दिनों से
उठ रहा एक सवाल है
क्या इंसान इस तरह
जीता हर हाल है

यूं ही किसी तरह बस
गुजरा वक्त हर हाल है
उम्मीदों के पंख पर
तैरता साल दर साल है 
    
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