Monday, 3 October 2016

धड़कनें खामोश हैं






दूर क्यों हो पास आओ जरा
देखो गगन से मिल रही धरा

कलियां खिल रही कितने जतन से
चाँद की रौशनी से नहाओ जरा

धड़कनें खामोश हैं वक्त है ठहर गया
जो नजरें मिली कदम रुक सा गया

हठ बचपनों सा अब तो छोड़िए
मन का संबंध मन से जोड़िए

वक्त काफी हो गया ख़ामोशी तो तोड़िए
व्रत मौन का खिलखिलाकर तोड़िए

    

16 comments:

  1. वाह, काफी समय बाद आपके ब्लॉग पर आकर पढ़ा। बहुत बढ़िया!!

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  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति कादम्बिनी गांगुली और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  3. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 05/10/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  4. सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. मन से मन का सम्बन्ध जुड़ जाये तो जीवन बन जाता है ... सुन्दर रचना ...

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  7. दूर क्यों हो पास आओ जरा
    देखो गगन से मिल रही धरा
    बहुत खूब

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  8. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ..... very nice ... Thanks for sharing this!! :) :)

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  9. दूर ही रहने दीजिए ,अपने को रोकिए

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  10. वाह, बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति। मुझे बेहद पसंद आई। आपके ब्‍लाग पर देर से आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

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  11. हठ बचपनों सा अब तो छोड़िए
    मन का संबंध मन से जोड़िए
    ऐसा हो जाये तो बहुत कुछ स्वतः ही सुधर जाएगा ! बेहतरीन प्रस्तुति झा साब

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