मरघट से मुरदे चिल्लाने लगे
हैं
लौट कर बस्तियों में आने
लगे हैं
इंसान बन गया है हैवान
मुर्दों में भी जान आने लगे
हैं
जानवरों पर होने लगी सियासत
इंसानों से भय खाने लगे हैं
रंगो खून का अलहदा तो नहीं
नासमझ कत्लेआम मचाने लगे हैं
‘राजीव’ जमाने की उलटबांसी न समझे
मुरदे भी मर्सिया गाने लगे
हैं
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