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Friday, 5 February 2016

घिर आए हैं ख्वाब





घिर आए हैं
ख्वाब फिर
उनींदी पलकों में

फागुनी खुशबुओं में लिपटी
इन हंसी ख्वाबों से
रेशमी चुनर बुन
पहना दूं क्या ?

धरती से आकाश तक
सज गई है
किरणों की महफ़िल
बज उठता है मधुर संगीत

चांदनी रातों के
मोरपंखी ख्वाबों से
जुड़ जाता है
प्रीत का रीत 



Saturday, 19 December 2015

क्या बोले मन

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क्या बोले मन
दिल का दर्द उभरकर
पलकों पर घिर आया
क्यूं बोले मन

बीती रात न जाने कितनी
कलियां फूल बनी मुस्काई
गिरी जहाँ पर बूंद ओस की
किरणों की झलकी अरुणाई

स्मृति के पन्नों में अंकित
विगत के सुमधुर क्षण
व्याकुल ह्रदय के भीतर
जैसे सूर्यास्त से विरही क्षण

न कोई जंजीर
जो बांध सके मन को
पल में विचरे धरती पर
पल में जाए नील गगन को 
    
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