Sunday, 25 September 2016

वक्त का मौसम




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होठों की हंसी देखे अंदर नहीं देखा करते
किसी के गम का समंदर नहीं देखा करते

कितनी हसीन है दुनियां लोग कहा करते हैं
मर-मरके जीने वालों का मंजर नहीं देखा करते

पास होकर भी दूर हैं उन्हें छू नहीं सकते
बिगड़े मुकद्दर की नहीं शिकवा करते

शीशे का मकां तो खूब मिला करते हैं
समय के हाथ में पत्थर नहीं देखा करते

‘राजीव’ देखा है वक्त का मौसम खूब बदलते
नादां है जो वक्त के साथ नहीं चला करते 
    

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर ...

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  2. आहा , क्या बात क्या बात ..बहुत ही उम्दा ..बांचते जाइए हम लोग गुनने को तैयार बैठे हैं ..उकेरते जाइए | सुन्दर

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  3. ‘राजीव’ देखा है वक्त का मौसम खूब बदलते
    नादां है जो वक्त के साथ नहीं चला करते

    ,..बहुत सुन्दर . सच वक्त के साथ नहीं चले तो पीछे कोई नहीं देखने वाला मिलता है

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  4. बहुत सुन्दर .....

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  5. सुन्दर पंक्तियाँ

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  6. अरे वाह क्या बात है बहुत ही उम्दा राजीव जी

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  7. पत्थर होते हैं हाथों में इसलिए काँच के घर तो नहीं छोड़ा करते ...
    बहुत खूब शेर हैं ...

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  8. शीशे का मकां तो खूब मिला करते हैं
    समय के हाथ में पत्थर नहीं देखा करते
    बहुत खूब राजीव जी ! शानदार अल्फ़ाज़

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