Sunday, 15 March 2015

बीत गए दिन


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   बीत गए दिन गुड़ियों वाले
परियों वाली रात गयी
पंख लगाकर उड़ी कल्पना
चाहत जागी नयी नयी  

मांग अटपटी सी रखती है
तन्हाई में आज उमर
पलक मूंदते ही आ जाता
सपनों में एक राजकुंवर

मानसरोवर के शतदल ज्यों
मधुबन में कोयल की गुंजन
खींच रहा विपुल वेग से
हाय ! तुम्हारा यह भोलापन 
                                                                                                                

21 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (16-03-2015) को "जाड़ा कब तक है..." (चर्चा अंक - 1919) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब ... सपनों के राजकुमार की कल्पना तो भोले मन की साध है ...
    सुन्दर गीत ...

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  3. सुंदर पंक्तियाँ

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  4. माधुर्य से संसिक्त रचना रसभरी।

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  5. माधुर्य से संसिक्त रचना रसभरी।

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  6. वाह वाह बहुत खूब...
    एक नई ताज़गी लिए हुए आपकी पंक्तिया.

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  7. बहुत खूब कही रविकर भाई .मुबारक .

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  8. बहुत सुन्दर ! कुंवारे सपनों का सजीव चित्रं !

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  9. सुंदर गीत के लिए बहुत बधाई

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  10. बहुत खूब रविकर जी

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    Replies
    1. क्षमा चाहता हूँ गलत नाम लिख दिया

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  11. उत्तम रचना

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  12. बहुत ही शानदार रचना। सपनो का सजीव प्रस्‍तुतिकरण।

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  13. सुन्दर रचना , सुन्दर छंद

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  14. सुंदर गीत ... बधाई

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