Monday, 20 January 2014

पलाश के फूल

खिल गए 
पलाश के फू
मंगल कुमकुम
कलश मधुरस

धूल धूसरित तन

मटमैला रंग
पास सड़कों से
दूर वनों तक
खिल उठा पलाश


वर्ष भर विस्मृत
रहता अनजान
पर अकस्मात्
सुन पीहू पुकार


मालकौंश राग
चटकदार पुष्प
लिए सूर्ख  
सिंदूरी लाल 

49 comments:

  1. Very beautiful lines like the flowers.

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  2. राजीव भाई बहुत ही मनमोहक व खूबसूरत कृति , धन्यवाद
    नया प्रकाशन -: कंप्यूटर है ! -तो ये मालूम ही होगा -भाग - २

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    1. सादर धन्यवाद ! आशीष भाई. आभार.

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  3. बहुत उम्दा कविता ......राजीव जी आभार

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  4. पलाश तो यादें ताज़ा कर देता अहि मधुमास की ...

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  5. बहुत सुंदर....

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (21-01-2014) को "अपनी परेशानी मुझे दे दो" (चर्चा मंच-1499) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. सुंदर कविता ......

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  8. खिल गए
    पलाश के फूल
    मंगल कुमकुम
    कलश मधुरस


    बहुत सुन्दर रचना !

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  9. वाह
    बेहद खूबसूरत अंदाजे बयाँ..

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  10. बहुत खुबसूरत..रचना...

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  11. मालकौंश राग
    चटकदार पुष्प
    लिए सूर्ख
    सिंदूरी लाल
    ....वाह...बहुत ख़ूबसूरत शब्द चित्र...

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  12. वसंत की अगवानी को तत्पर खूबसूरत रचना आदरणीय राजीव जी

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  13. बहुत खूबसूरत रचना, बधाई.

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  14. सुन्दर रचना

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  15. सुन्दर मनोहर कोमल स्वर रूपकत्व लिए रूप सौंदर्य लिए।

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  16. शुक्रिया आपकी निरंतर उपस्थिति का हृदय से आभार। बहुत सुन्दर रचना है यह।

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  17. वर्ष भर विस्मृत
    रहता अनजान
    पर अकस्मात्
    सुन पीहू पुकार


    मालकौंश राग
    चटकदार पुष्प
    लिए सूर्ख
    सिंदूरी लाल

    बेहद की सुन्दर रचना है भाई साहब

    वर्ष भर विस्मृतरहता अनजान
    पर अकस्मात्
    सुन पीहू पुकार


    मालकौंश राग
    चटकदार पुष्प
    लिए सूर्ख
    सिंदूरी लाल

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