Monday, 24 February 2014

मन पलाशों के खिले हैं

नेह के रथ से मिले
संकेत अमलतास के
लौट आए टहनियों के
लालनीले
पंख वाले दिन

मन पलाशों
के खिले हैं
हर घड़ी-पल-छिन
अंग फिर खुलने लगे हैं
फागुनी लिबास के

अधर गुनगुना उठे,ह्रदय में
सुमन खिले हैं आस के
रंग रंगीले दिन आये हैं
मधुर हास-परिहास के

कौन पखेरू धुन मीठी यह
घोल गया है कान में
मन वीणा पर गीत प्रणय के
छिड़े सुरीली तान में   
    

46 comments:

  1. मौसम का असर हर शै पर है. सुंदर रचना .

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  2. कौन पखेरू धुन मीठी यह
    घोल गया है कान में....
    manbhaawan post hai aapka....

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  3. क्या बात है दोस्त अतिसुन्दर प्रतीक धूप आपके जीवन में खिले खिलती रहे।

    बेहद सांगीतिक रचना रूपक परिधान पहने हुए।

    नेह के रथ से मिले
    संकेत अमलतास के
    लौट आए टहनियों के
    लालनीले
    पंख वाले दिन

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  4. स्वागत है , सुन्दर शब्दों का

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    Replies
    1. सादर धन्यवाद ! योगी जी. आभार.

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  5. शब्दों के पलाश तो खिल रहे हैं ... मस्त गीत है ...

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति |मौसम के अनुकूल |

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  7. ऐसा लग रहा है पूरा मौसम आपकी इन सुन्दर पंक्तियों में पसर गया है!! बहुत सुन्दर!!

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (25-02-2014) को "मुझे जाने दो" (चर्चा मंच-1534) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. बहुत सुंदर रचना..

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  10. मौसम को समेटते हुए आपके शब्दों की मोती ,सुन्दर

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  11. बहुत सुंदर...!!

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  12. मन पलाशों
    के खिले हैं
    हर घड़ी-पल-छिन
    अंग फिर खुलने लगे हैं
    फागुनी लिबास के

    बहुत कोमल पदावली सुन्दर प्रस्तुति।

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  13. बहुत सुन्दर....

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  14. खुशनुमा अहसास...फागुन के सारे रंग उतर आए हैं आपकी इस रचना में...

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  15. वाह बहुत सुन्दर सरस मनोहारी कविता लिखी है , बधाई आपको

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  16. मन को दुलराती भाषा का अप्रतिम सौंदर्य लिए है ये लयताल का पैटर्न लिए छांदिक रचना।

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  17. सादर प्रणाम!
    ............बहुत ही सुन्दर रचना.......................फूलों सी नाजुक

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    Replies
    1. सादर धन्यवाद ! अनिल जी. आभार.

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  18. सुन्दर रचना

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  19. आपकी निरंतर प्रेरक उत्प्रेरक अर्थ गर्भित टिपण्णियों के लिए आपका आभार।

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  20. फगुआ के आने का संकेत कवि अक्सर अपनी कविताओं और भावों के माध्यम से कर ही देते हैं. बहुत अच्छा लगा.

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  21. मन पलाशों
    के खिले हैं
    हर घड़ी-पल-छिन
    अंग फिर खुलने लगे हैं
    फागुनी लिबास के

    क्या खूब लिखते हैं आप.

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