Saturday, 19 December 2015

क्या बोले मन

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क्या बोले मन
दिल का दर्द उभरकर
पलकों पर घिर आया
क्यूं बोले मन

बीती रात न जाने कितनी
कलियां फूल बनी मुस्काई
गिरी जहाँ पर बूंद ओस की
किरणों की झलकी अरुणाई

स्मृति के पन्नों में अंकित
विगत के सुमधुर क्षण
व्याकुल ह्रदय के भीतर
जैसे सूर्यास्त से विरही क्षण

न कोई जंजीर
जो बांध सके मन को
पल में विचरे धरती पर
पल में जाए नील गगन को 
    

15 comments:

  1. न कोई जंजीर
    जो बांध सके मन को
    पल में विचरे धरती पर
    पल में जाए नील गगन को
    ..बहुत सही ....मन की गति सबसे तेज ..
    मेरो मन अनंत कहाँ सुख पावै
    जैसे उडी जहाज को पंछी पुनि जहाँ पर आवै ...

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  2. बहुत सुन्दर

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-12-2015) को "जीवन घट रीत चला" (चर्चा अंक-2196) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत सुन्दर रचना

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  5. सुंदर कविता

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  6. बहुत सुंदर कविता। बहुत ही अच्‍छी लगी पढ़कर।

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  7. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

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  8. बहुत सुन्दर रचना !

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  9. बहुत सुन्दर रचना !

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  10. बीती रात न जाने कितनी
    कलियां फूल बनी मुस्काई
    गिरी जहाँ पर बूंद ओस की
    किरणों की झलकी अरुणाई
    खूबसूरत शब्द ! खूबसूरत अंदाज़

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  11. बहुत सुंदर रचना ।

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