Saturday, 21 February 2015

क्यों वादे करते हैं


                                                               
                              
 अपनों से दिल टूट गया गैरों में हम चलते हैं
सुनने वाला कोई नहीं ख़त्म कहानी करते हैं

उम्र भर रस्ता देखा आंखें भी पथराती रहीं
इस राह आना ही नहीं क्यों रस्तों को तकते हैं

वादा करके भूलने वाले इसकी चुभन वे क्या जानें
पूरा होने का सबब नहीं फिर क्यों वादे करते हैं

 बंद लबों पर अनकही बातें कहने को बेताब रहें
मिलने पर लब हिले नहीं ठंढी आहें भरते हैं

दिल के दीवाने मौत से कब डरने लग जाएं
‘राजीव’ जीने वालों का हाल सुनाते फिरते हैं 
                                                                                                                

18 comments:

  1. वादा करके भूलने वाले इसकी चुभन वे क्या जानें
    पूरा होने का सबब नहीं फिर क्यों वादे करते हैं

    बंद लबों पर अनकही बातें कहने को बेताब रहें
    मिलने पर लब हिले नहीं ठंढी आहें भरते हैं
    एकदम बढ़िया रचना श्री राजीव कुमार जी

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  2. वादा करके भूलने वाले इसकी चुभन वे क्या जानें
    पूरा होने का सबब नहीं फिर क्यों वादे करते हैं......बहुत सुंदर

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  3. वाह! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!!

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  4. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (22-02-2015) को "अधर में अटका " (चर्चा अंक-1897) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. आपने तो बिल्कुल हक़ीकत को बयान कर दिया है,सार्थक प्रस्तुति.

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  6. वादों का नाता है गहरा
    बे-वादा हो जाना---
    सो काहे का रोना
    पछताना भी बे-वादा है.

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  7. हकीकत बयान करते शेर ... बहुत सटीक अभिव्यक्ति ...

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  8. बंद लबों पर अनकही बातें कहने को बेताब रहें
    मिलने पर लब हिले नहीं ठंढी आहें भरते हैं
    .
    लाज़वाब,शेर हैं.मज़ा आगया.

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  9. "‘राजीव’ जीने वालों का हाल सुनाते फिरते हैं" बेहत ही सुन्दर :)

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  10. सही कहा आपने ........सुन्दर रचना!

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  11. वादा करके भूलने वाले इसकी चुभन वे क्या जानें
    पूरा होने का सबब नहीं फिर क्यों वादे करते हैं
    ......बहुत सुंदर

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  12. मिलने पर लब हिले नहीं ठंढी आहें भरते हैं...सुन्दर अभिव्यक्ति! साभार! राजीव जी!
    धरती की गोद

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