Saturday, 7 February 2015

तनहा शाम है



न चैन तुम्हें है
न हमें आराम है
दोनों की सुबह उदास
और तनहा शाम है

कभी दर्द बनकर
कभी दवा बनकर
रह गई उम्र
फ़लसफ़ा बनकर

रंजिश न बढ़ा
न रह जाए
हर मुलाकात
फासला बनकर 
    

22 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8-2-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1883 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. वाह..वाह..क्‍या बात है। बहुत खूब भाई साहब।

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  4. बहुत खूब ... रंजिशें कम होनी चाहियें ...
    मज़ा आया ...

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  5. वाह वाह, बेहतरीन

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  6. ख़ूबसूरत पंक्तियाँ, सुंदर अभिव्यक्ति...

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  7. सुन्दर कविता . अंतिम पंक्तियों में 'रहा जाए' शायद 'रह जाए' होगा

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    1. सादर आभार. टाइपिंग की त्रुटि है.सुधार कर लिया गया है.

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  8. छोटे छन्दों में रची प्यारी सी कविता... दोनों तरफ बराबर लगी आग कहूँ या दर्द का दर्द से मिलकर दवा बन जाना कहूँ... बस कुछ न कहा जाये तो शायद सब कहा जा सकेगा!!

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  9. हक़ीक़त!
    बहुत सुन्दर रचना
    आभार

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  10. अहसासों से लवरेज़ सुंदर प्रस्तुति।

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  11. रंजिश न बढ़ा
    न रह जाए
    हर मुलाकात
    फासला बनकर
    हर बार जीवन में यहीं होता हैं

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  12. आपको सपरिवार होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ .....!!
    http://savanxxx.blogspot.in

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  13. Fantastic beliefs you possess here.. Value the admission you made available.. My personal web searches seem total.. thank you. Great ideas you might have here..

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  14. आज बहुत कोशिश करने पर भी कुछ नहीं लिख पाया। शायद अब लिखने के लिए बहुत कुछ हैं, बहुत कुछ में जो कुछ था लिखने के लिए वहीं कहीं खो गया हैं.

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  15. आखिरी कुछ पंक्तियां सच में सटीक और प्रभावी बन पड़ी हैं ! और जैसा आदरणीय दिगंबर जी ने कहा , रंजिशें कम होनी ही चाहिए ! बेहतरीन प्रस्तुति

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