Saturday, 9 May 2015

इंसानियत दफ़न होती रही


                                   
                   मजहब के नाम पर लोग लड़ते रहे            इंसानियत रोज दफ़न होती रही

सजदे करते रहे अपने अपने ईश्वर के
सूनी कोख मां की उजड़ती रही

मूर्तियों पर बहती रही गंगा दूध की
दूध के बिना बचपन बिलबिलाती रही

लगाकर दाग इंसान के माथे पर
हैवानियत इंसान को डसती रही

किस किस को कैसे जगाएं ‘राजीव’
  इंसानियत गहरी नींद में सोती रही    


                                     

15 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-05-2015) को "सिर्फ माँ ही...." {चर्चा अंक - 1971} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. इंसानियत सोती रही,मार्मिक चित्रण

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  3. सुन्दर प्रस्तुति

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  4. बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना...

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  5. समाज की हकीकत हो सुन्दर शब्द दिए हैं आपने आदरणीय राजीव जी ! हर जगह कुत्सित मन के लोग होते हैं जिनकी वजह से पूरा समाज कलंकित होता है !

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  6. कटु सत्य...अत्यंत भावपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी !

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  7. हमारे समाज काे सुधरना ही होगा। असंवेदनशीन विश्‍व मानव के विनाश का कारण बन सकता है।

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  8. कितनी विडम्बना है न?
    पत्थर पिघल जाते हैं हैं पर इंसान नहीं।

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  9. किस किस को कैसे जगाएं ‘राजीव’
    इंसानियत गहरी नींद में सोती रही ....
    जब इंसान हो सो गया तो इंसानियत को तो सोना ही है ...
    भावपूर्ण गहरी रचना ...

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  10. भावपूर्ण एव हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति।मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  11. राजीव जी, सोती हुई इंसानियत को बहुत ही सुन्दर शब्दों में पिरोया है आपने!...

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  12. किस किस को कैसे जगाएं ‘राजीव’
    इंसानियत गहरी नींद में सोती रही....................बेहतरीन रचना !

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