Thursday, 27 August 2015

यूँ नहीं मिला होता



गर तुमसे यूँ नहीं मिला होता
कोई खटका दिल में नहीं हुआ होता


तुम्हें भुलाने की लाख कोशिश की मैंने
गर मेरे दिल में नश्तर नहीं चुभोया होता


दोस्ती-दुश्मनी में फर्क मिटा दिया तुमने
गर अहदे वफ़ा का सिला नहीं दिया होता


रास्ते का पत्थर जो समझ लिया तुमने
गर ठोकर में न उड़ा दिया होता


हर किसी पे एतबार नहीं करना ‘राजीव’
गर हर मोड़ पर धोखा नहीं दिया होता 

   

18 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.08.2015) को "सोच बनती है हकीक़त"(चर्चा अंक-2081) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - ऋषिकेश मुखर्जी और मुकेश में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. तुम्हें भुलाने की लाख कोशिश की मैंने
    गर मेरे दिल में नश्तर नहीं चुभोया होता


    दोस्ती-दुश्मनी में फर्क मिटा दिया तुमने
    गर अहदे वफ़ा का सिला नहीं दिया होता
    खूबसूरत अल्फ़ाज़ !!

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  4. खूबसूरत अल्फाज।

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  5. बेहतरीन , बहुत खूब , बधाई अच्छी रचना के लिए
    कभी इधर भी पधारें

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  6. बेहद सुन्दर गजल

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  7. बहुत ही लाजवाब और बेहतरीन ग़ज़ल है ...

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  8. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

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  9. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  10. बहुत सुन्दर शब्द रचना
    http://savanxxx.blogspot.in

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  11. बहुत सुन्दर शब्द रचना
    http://savanxxx.blogspot.in

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