Thursday, 12 September 2013

चाँद जरा रुक जाओ













चाँद जरा रुक जाओ 

आने दो दूधिया रौशनी 

सितारों थोडा और चमको 

बिखेर दो रौशनी 
        

       मैं अपने महबूब को        

       ख़त लिख रहा हूँ        

       चांदनी रात में       

       महबूब को ख़त लिखना        

       कितना सुकूं देता है 

तुम यादों में बसे 

या ख्वाबों में 

दिल की गहराईयों में 

एक अहसास जगा देता है 
        

       तुम कितने पास हो         

       मैं कितना दूर         

       एक लौ है जो         

       दोनों में जली हुई 

नयनों के कोर से  

कभी देखा था तुझे 

सिमट आई थी लालिमा 

रक्ताभ कपोलों पर
          

          तारों भरी रात में           

         गीली रेत पर चलते हुए           

         हौले से छुआ था तुमने          

         सुनाई दे रही थी           

         तुम्हारे सांसों की अनुगूंज           

         नि:स्तब्द्धता को तोड़ते हुए 

तुम इतने दूर हो 

जहाँ जमीं से आसमां 

कभी नहीं मिलता 

ये ख्वाब हैं 

ख्वाब ही रहने दो  


24 comments:

  1. बहुत सुन्दर .

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  2. बहुत सुन्दर रचना..
    :-)

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  3. Replies
    1. सादर धन्यवाद ! प्रदीप जी. आभार.

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  4. बहुत सुन्दर भाव.

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  5. जहाँ जमीं से आसमां
    कभी नहीं मिलता
    ये ख्वाब हैं
    ख्वाब ही रहने दो

    .................... सुंदर पंक्तियाँ

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    Replies
    1. सादर धन्यवाद ! संजय जी आभार.

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  6. सुखद अहसास!
    प्रियतम के पास
    यादों में या ख्वाबों में
    बस गूँजती है साँस ....

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  7. सुहानी चांदनी में चाँद से मुलाकात !
    बहुत बढ़िया !

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  8. तारों भरी रात में
    गीली रेत पर चलते हुए
    हौले से छुआ था तुमने
    सुनाई दे रही थी
    तुम्हारे सांसों की अनुगूंज
    नि:स्तब्द्धता को तोड़ते हुए ...
    ये निताब्धता उनके साथ ख्यालों में ले जाती है जहां होते हैं हम तुम ... कोई दूजा नहीं ...

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  9. तुम कितने पास हो
    मैं कितना दूर
    एक लौ है जो
    दोनों में जली हुई

    यह लौ ही तो हमारी चांद के साथ नजदीकी बनाये रखती है।

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  10. आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 19/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
    आप भी पधारें, सादर ...

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  11. सुंदर रचना है , आभार आपका !

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    Replies
    1. सादर धन्यवाद ! सतीश जी . आभार .

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