Saturday, 10 January 2015

तेरी आँखें


                                                 
                      इक महका ख्वाब है तेरी आखें               मेरे ख़त का जबाब है तेरी आँखें
पलकें करें सजदा चाहत बनकर
अदब का आदाब है तेरी आँखें

जुबां का मेरे समझ लेती हैं पैगाम
मेरे दिल की किताब हैं तेरी आँखें
रफ्ता-रफ्ता आगाज शबे महफ़िल का
शोख माहताब हैं तेरी आँखें

कितने ही मयकश हुए दीवाने
गुस्ताखियों से आबाद हैं तेरी आँखें
थरथराने लगी लौ शम्मा की
दो जलते चिराग हैं तेरी आँखें

चाँद भी छूप गया बादलों की ओट
सूरज सी आफ़ताब हैं तेरी आँखें
झुकी-झुकी नजरों में समायी हया
‘राजीव’ अनुराग हैं तेरी आँखें 

17 comments:

  1. सुन्दर ग़ज़ल

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (11-01-2015) को "बहार की उम्मीद...." (चर्चा-1855) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सादर धन्यवाद ! आ. शास्त्री जी. आभार.

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  3. गीत वही जो दिल से निकले और दिल की बात करे। बेहतरीन गीत।

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  4. तेरी आँखों के सिवा दुनिया मिएँ रक्खा क्या है ...
    बहुत लाजवाब गीत ...

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  5. बहुत ही सुन्दर...
    बेहतरीन....
    :-)

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  6. वाह ! बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति ! बहुत बढ़िया !

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  7. वाह... खुबसूरत गज़ल कही सर बधाई सर

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  8. खूबसूरत अभिव्यक्ति....

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  9. aapke iss khoobsurat gazal ne unki aankho ko aur khoobsurat bana diya hai....behtareen prastuti..

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  10. सुन्दर गजल ,बेतरीन अभिव्यक्ति

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