Thursday, 15 January 2015

फासले कब मिटा करते हैं


                 हम जब भी मिला करते हैं           
क्यों लोग गिला करते हैं
कदम तपती राहों पर कब थमते हैं
फूल प्यार के खिजां में खिला करते हैं

तनहाइयों से डर क्यूँ जाते हो
आँखों के कटोरों को नम क्यों कर जाते हो
फासले जमीं-आसमां के कब मिटा करते हैं
दर्दे दिल यूँ ही बढ़ा करते हैं

तस्वीर तेरी आँखों से न हट पाती है
जिंदगी तुम बिन न कट पाती है
रंजिशों में उम्र बिता करते हैं 
'राजीव' जख्म दिल के अश्कों से सिला करते हैं 


18 comments:

  1. सुंदर भावाभिव्यक्ति.... मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!!

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (16.01.2015) को "अजनबी देश" (चर्चा अंक-1860)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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    1. सादर धन्यवाद ! राजेन्द्र जी. आभार.

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  3. ..प्यार से प्यार बढ़ता है ... फिर लोगों की क्या परवाह करना..
    बहुत सुन्दर

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  4. प्यारी रचना ............

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  5. बहुत खूब ... जख्म तो अश्क सिल ही देंगे ... पर प्रेम में जख्म का डर कैसा ...

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  6. वाह ! बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ! हर शब्द भावपूर्ण हर भाव मर्मस्पर्शी !

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  7. वाह सुंदर भावाभिव्यक्ति.... मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!!

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    मकरसंक्रान्ति की शुभकामनायें

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  9. बहुत ख़ूबसूरत रचना...

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  10. सुन्दर प्रस्तुति

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