Thursday, 22 October 2015

बीते न रैन

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मीठी धूप खिली
महकी फिर शाम
पागल हवा देती
तुम्हारा पैगाम !

महक रही जूही
चहक रही चंपा
थिरक रहा अंगना
बज रहा कंगना !

रात है अंधेरी
छाये काले बादल
फिर याद तुम्हारी
कर देती पागल !

कुछ कहते नैन
अब नहीं चैन
मिल जाएं गले
बीते न रैन !
    

20 comments:

  1. मीठी धूप खिली
    महकी फिर शाम
    पागल हवा देती
    तुम्हारा पैगाम, बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.10.2015) को "शुभ संकल्प"(चर्चा अंक-2138) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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  3. विजयादशमी की शुभकामनाऐं । सुंदर रचना ।

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  4. बहुत ही सुन्दर और सजी रचना

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  5. बहुत सुन्दर। दशहरे की शुभकामनाएँ।

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  6. सुन्दर...
    आपको विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

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  7. Wah bahut sundar....vijyadashmi ki shubkamnayein

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  8. बहुत खूब...
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं...

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  9. महकी फिर शाम
    पागल हवा देती
    तुम्हारा पैगाम, बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति।

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  10. सुन्दर प्रस्तुति.

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  11. कोमल अहसासों की बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति...

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  12. बेहतरीन प्रस्तुति

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  13. Excellent poem, Thanks Rajeevji. Please join my blog if you like it.

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  14. सुन्दर शब्द रचना......... बधाई
    http://savanxxx.blogspot.in

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