Tuesday, 6 October 2015
Saturday, 26 September 2015
जुबां पर आए तो सही
बंद होठों के कोरों से
मुस्कुराए तो सही
खामोशी से जो बात न बन पाए
थोड़ा कह कर बहुत कुछ कह जाए
तो सही
जीने का उल्लास रजनीगंधा सी
महक उठती हैं
मन का संताप खुद ही बह जाए
तो सही
सपनों में पलाश के रंग भर
उठते हैं
मुद्दत बाद जो उनसे मिल
पाए तो सही
जीने की वजह फिर बन जाए
‘राजीव’
भूला हुआ परिचय जो मिल पाए
तो सही
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Tuesday, 8 September 2015
दिन कितने हैं बीत गए
दिन कितने हैं बीत गए
याद है वो हंसी-ठिठोली
करूं प्रतीक्षा बैठी कब से
साथ चलूंगी लाओ डोली |
दिन कितने हैं बीत गए
रुके नहीं हैं आंसू झरते
आज ह्रदय के दीपक जलते
आज मना लूं तुम संग होली |
दिन कितने हैं बीत गए
फिर ह्रदय में हलचल मचते
संभल नहीं पाता एकाकीपन
आज सुनूं जो प्रणय की बोली |
करूं प्रतीक्षा बैठी कब से
साथ चलूंगी लाओ डोली ||
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Thursday, 27 August 2015
यूँ नहीं मिला होता
गर तुमसे यूँ नहीं मिला
होता
कोई खटका दिल में नहीं हुआ
होता
तुम्हें भुलाने की लाख कोशिश की मैंने
गर मेरे दिल में नश्तर नहीं
चुभोया होता
दोस्ती-दुश्मनी में फर्क मिटा दिया तुमने
गर अहदे वफ़ा का सिला नहीं
दिया होता
रास्ते का पत्थर जो समझ लिया तुमने
गर ठोकर में न उड़ा दिया
होता
हर किसी पे एतबार नहीं करना ‘राजीव’ |
Friday, 14 August 2015
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