फिर कहीं दिल मचल गया होता
वक्त तक होश में जो रहा
होता
इक आग सुलग उठती सीने में
रफ्ता-रफ्ता जो हवा दिया
होता
इस उम्र का तकाजा भी क्या
कहिए
दिल के हाथों मजबूर न हुआ
होता
ये तो अच्छा हुआ लोग सामने
न थे
वरना भीड़ से पत्थर उछल गया
होता
दर्दे दिल की दवा क्या करिए
‘राजीव’
दिल अपने वश में जो रहा
होता
बहुत सुंदर !
ReplyDeleteइस उम्र का तकाजा भी क्या कहिए
ReplyDeleteदिल के हाथों मजबूर न हुआ होता
ये तो अच्छा हुआ लोग सामने न थे
वरना भीड़ से पत्थर उछल गया होता
बहुत बेहतरीन श्री राजीव जी !!
सुन्दर प्रस्तुति...
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ReplyDeleteये तो अच्छा हुआ लोग सामने न थे
ReplyDeleteवरना भीड़ से पत्थर उछल गया होता....
'......
बहुत सुन्दर
वाह...बहुत ख़ूबसूरत अशआर...बहुत सुन्दर
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर पंक्तियां।
ReplyDeleteEnjoy 15% Off on any of the print packages and the next Ebook for free to welcome 2016, and also get cash back offer Up to 3500
ReplyDeleteEbook Publishing cash back offer
यह भावुक और सच्ची कहानी है।
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